ऑनलाइन दो दिवसीय सेल्फ पोर्ट्रेट वर्कशॉप सम्पन्न

ऑनलाइन दो दिवसीय सेल्फ पोर्ट्रेट वर्कशॉप सम्पन्न

– मुंबई से विक्रांत बिशे ने शीशे में देखकर दिया सेल्फ पोर्ट्रेट का डिमांस्ट्रेशन।

लखनऊ। पोर्ट्रेट बनाने के लिए एक बेसिक नॉलेज होनी बहुत जरूरी है। एक चित्र एक व्यक्ति की पेंटिंग, फोटोग्राफ, मूर्तिकला या अन्य कलात्मक प्रतिनिधित्व है, जिसमें चेहरा और उसकी अभिव्यक्ति प्रमुख है। व्यक्ति की समानता, व्यक्तित्व और यहां तक कि मूड को प्रदर्शित करता है।

आशय, व्यक्ति के रूप, व्यक्तित्व और यहां तक कि उसकी मनोदशा को भी प्रदर्शित करना होता है। जब कलाकार खुद अपना चित्र बनाता है तो उसे आत्म-चित्रांकन कहते हैं।
अस्थाना आर्ट फोरम के ऑनलाइन मंच पर हो रहे वर्कशॉप में वृहस्पतिवार को मुम्बई से युवा चित्रकार विक्रांत बिशे ने अपने आत्मचित्रण का डेमोंस्ट्रेशन दिया। यह डिमांस्ट्रेशन दोनो दिन एक से डेढ़ घण्टे ऑनलाइन किया गया। जिसमें देश के अलग अलग प्रदेशों से लोगों ने भाग लिया। वर्कशॉप में करुणा मोहिंदर (लुधियाना),कृष्णा ब्रह्मनिया (सूरत ), मनसा सहगल (मुंबई), पूनम सोनी (लखनऊ उत्तर प्रदेश), शदमा ख़ान, डॉ सरिता द्विवेदी (उत्तर प्रदेश),निकुन अग्रवाल, अनिल कुमार (गोवा),प्रीति दास,जयलक्ष्मी दसरी आदि प्रतिभागियों ने इस ऑनलाइन वर्कशॉप में भाग लिया।
क्यूरेटर भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने बताया कि इस डिमांस्ट्रेशन में विक्रांत बिशे ने आयल माध्यम में ख़ुद को शीशे में देखकर पोर्ट्रेट बनाया। यह सिर्फ पोर्ट्रेट ही नहीं बल्कि ख़ुद पर एक प्रयोग था।
विक्रांत ने अपने डिमांस्ट्रेशन के दौरान प्रतिभागियों के तमाम प्रश्नों के उत्तर भी दिए और बारीकियों को बख़ूबी बताया। विक्रांत ने कहा कि हमारे अंदर विचारों का भंडार है जो समय समय पर हमारे चेहरों पर प्रदर्शित होता है। तमाम भाव भावभंगिमा हमारे चेहरे पर रंगों के साथ उभरते रहते हैं। कलाकार उन्ही विचारों को रंगों के साथ उकेरता है। हमे चित्र बनाते समय इन विचारों को महसूस करना चाहिए तभी ऐसे चित्र सम्भव होते हैं। विक्रांत ने आगे बताया कि हमे अच्छे चित्र बनाने के लिए अच्छे मैटेरियल का भी प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि यह हमारी मेहनत होती है। तमाम कलाकारों ने अपने आत्मचित्रण किये हैं। प्राकृतिक और स्टुडियों के प्रकाश में अंतर होता है। प्राकृतिक प्रकाश पल पल बदलता रहता है इसलिए जब हम प्राकृतिक प्रकाश में चित्र बनाते हैं तो बहुत चौकन्ना रहना पड़ता है। स्टुडियों में हम अपनी मुताबिक प्रकाश डाल कर अपने चित्र बना सकते हैं। सब मिलाकर इनके लिए एक रियाज़ की जरूरत होती है। किसी भी कला को करने के लिए रियाज बहुत जरूरी है। मीडियम की अपनी सीमा होती है। पोर्ट्रेट के लिए केवल यही धारणा नहीं है कि वह रियलिस्टिक ही हो बल्कि पोर्ट्रेट के साथ बहुत से प्रयोग भी कलाकारों ने किए हैं अपने दृष्टिकोण से। जो क्रिएटिव पोर्ट्रेट के रूप में देखते हैं। अपने आपको सीसे में देखकर बनाना या ख़ुद को कल्पना करना एक चुनौती पूर्ण कार्य होता है।
विक्रांत ने अपने आत्मचित्रण के साथ बहुत से प्रयोग भी किये हैं जो इनकी कल्पना और आंतरिक गहरी विचारों का एक स्रोत बनी।

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