अमूर्त कला यथार्थ से प्रस्थान का संकेत करती है

अमूर्त कला यथार्थ से प्रस्थान का संकेत करती है
लखनऊ। कला जीवन की जरूरत है। इससे हटकर जो लोग जीवन की कल्पना करते हैं, वे जीवन से ठीक-ठाक तालमेल नहीं बना पाते और स्वाभाविक रूप से जड़ता के शिकार भी होते हैं। कलाभिव्यक्ति और उसे देखने की लगन मनुष्य की प्रारंभिक समझ व सोच से जुड़ी एक सहज प्रक्रिया है। जब कलाकार आकार, रंग, रेखा से युक्त दृश्य भाषा में एक ऐसा संयोजन सृजित करता है जिसमें उसकी स्वतंत्रता और बोध एक दृश्य- सन्दर्भ प्राप्त कर लेते हैं तो वह अमूर्त कला है। अमूर्त कला यथार्थ से प्रस्थान का संकेत करती है और बिंबों के माध्यम से स्वयं को प्रकट करती है। इसमें यथार्थ से परे एक ऐसे संसार को दिखाने की चेष्टा होती है जो हमारे अंतर का यथार्थ हो सकता है। अमूर्तन ज्यामितीय तथा गीतात्मक दोनों तरह के हो सकते हैं।
कल्पनाएं भले परिवेश तथा उसके जीने के माहौल से प्रभावित रहती हों, लेकिन होती असीम है।
आज अस्थाना आर्ट फोरम की 5वीं ऑनलाइन कार्यशाला सम्पन्न हुई। जिसमें विशेषज्ञ कलाकार के रूप में गुजरात से भारवी त्रिवेदी रहीं। आज की यह कार्यशाला कोलाज़ के साथ एब्सट्रेक्ट पर आधारित थी। यह आयोजन भूपेंद्र अस्थाना के संयोजन में रचनात्मक मंच के तहत किया गया। यह एक बहुत ही मनोरंजक जीवंत सत्र था जिसमें प्रतिभागियों को एक अंतःआकर्षक तरीके से सम्मिलित किया गया था, जहां कलाकार भारवी ने अपने अनुभवों और कला यात्रा के तमाम अनुभवों के हिस्सा लेकर अपने कार्य को प्रदर्शित कर किया। उन्होंने गुजरात मे स्थित अपने स्टूडियो की भी एक झलक कार्यशाला में भाग लेने वालों को दिखाई। जहाँ अनेको अमूर्त कलाकृतियों की डिस्प्ले भी थी। भारवी ने कहा कि अमूर्त की यात्रा, जो इतनी आसान लगती है, इतनी आसान नहीं होती कि यह हमेशा एक ऐसी प्रक्रिया होती है, जो उसके पीछे काम करती है । और किसी कलाकार को एक अवसर प्रदान करती है। यह यात्रा हमेशा बहुत ही प्रेरक और रोचक होती है।
इस वर्कशॉप में उत्तर प्रदेश से डॉ सरिता द्विवेदी, गुवाहाटी से अदिति डेका, असम से ककोली,बैट्रिक मोसेस मुंबई से, दिल्ली से अनिल बोडवाल, नागपुर से सुहानी जैन सहित काफी संख्या में लोग शामिल हुए।
भारवी अपने अमूर्त काम मे कोलाज़ का प्रयोग करती हैं। तमाम हैंडमेड , पैकिंग वाले गत्ते आदि कागज़ , लकड़ी आदि का बड़ी ही सावधानी से तथा अपने विचारों के साथ चिपका कर अमूर्त कलाकृतियों का निर्माण करती हैं। भारवी ने आज इस कार्यशाला में अपने काम करने की तकनीकी और कलात्मकता की चर्चा की। साथ ही अपने माध्यम का प्रयोग करते हुए एक कलाकृति की रचना भी की। इस दौरान प्रतिभागियों ने अपने प्रश्न भी रखे जो अमूमन अमूर्तन को लेकर लोगों के मन मे होते हैं भारवी ने बड़े ही सरलतापूर्वक अपने कला के माध्यम से उत्तर दिया और तमाम भ्रांतियों को दूर भी किया।

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