-63वें ऑल इंडिया आब्सटेट्रिक्स एंड गाइनोकोलॉजी 2020  के तीसरे दिन विशेषज्ञों की राय

-63वें ऑल इंडिया आब्सटेट्रिक्स एंड गाइनोकोलॉजी 2020  के तीसरे दिन विशेषज्ञों की राय

लखनऊ। आशियाना स्थित मान्यवर कांशीराम स्मृति उपवन में चल रहे 63वें ऑल इंडिया आब्सटेट्रिक्स एंड गाइनोकोलॉजी (एआईसीओजी 2020)  के तीसरे दिन  हैंड जोन सिमुलेटर वर्कशॉप का आयोजन किया गया। जिसमें लॉस एंजिलिस से आईं डॉ. अपर्णा श्रीधर ने ट्रांस एब्डॉमिनल और ट्राब्स वेजाइनल अल्ट्रासॉउन्ड के बारे में जानकारी उन्होंने बताया कि ये दोनों ही अल्ट्रासॉउन्ड के एडवांस जांच तकनीकियां हैं। इन दोनों ही जांचों में गर्भ में पल रहे शिशु को होने वाली समस्याओं के बारे में जानकारी मिल जाती है। इसकी विशेषता यह होती है कि शिशु जब गर्भ में मात्र पांच सप्ताह का होता है तभी उसकी जांच की  जा सकती है। जबकि उसका पांच सप्ताह में शिशु की ग्रोथ एक या दो मिलीमीटर से ज्यादा नहीं होती। चिकित्सा के क्षेत्र में यह एक एडवांस तकनीक है। उन्होंने बताया कि अभी तक आमतौर पर 15-20 सप्ताह में अल्ट्रासॉउन्ड के जरिये शिशुओं की बीमारियों की पहचान हो पाती थी लेकिन अब यह मात्र पांच सप्ताह में ही पकड़ में आने लगी हैं। इसका लाभ यह होता है कि किसी प्रकार की समस्या शिशु में आती है तो उसका समय पर इलाज शुरू हो जाता है या गंभीर परिस्थितियों में सही निर्णय लेकर माँ की जान बचाई जा सकती है। इस वर्कशॉप की कन्वीनर डॉ. प्रीती कुमार और डॉ. मोनिका अग्रवाल रहीं। डॉ. प्रीती कुमार ने बताया कि एआईसीओजी में यह वर्कशॉप पहली बार आयोजित हुई है। इसमें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञों द्वारा 50 प्रतिभागियों को ट्रेनिंग दी गई। डॉ. प्रीती कुमार ने कहा कि इस ट्रेनिंग का मकसद है कि ज्यादा से ज्यादा जच्चा-बच्चा को स्वस्थ रखा जाए। एडवांस तकनीकियों की ट्रेनिंग के जरिये ही इसको पूरा किया जा सकता है। द फेडरेशन ऑफ ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनोकोलॉजी सोसायटी ऑफ इंडिया (फॉग्सी) के तत्वाधान में एआईसीओजी 2020 का आयोजन लखनऊ ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनोकोलॉजी सोसायटी करा रहा है।

बेरियाट्रिक सर्जरी के दो साल बाद करें प्लानिंग
मुंबई से आए डॉ. अमित पटकी ने बताया कि युवतियों में भी मोटापे की समस्या आम हो रही है। जिसकी वजह खराब दिनचर्या और खानपान है। मोटापे की वजह से डायबिटीज, हायपरटेंशन, बांझपन जैसी समस्याएं हो रही हैं। युवतियों को एक्सरसाइज करना बेहद जरुरी है। क्योंकि प्रेग्नेंसी के दौरान काफी दिक्कते आती हैं। उन्होंने बताया कि मोटापे से निजात के लिए बेरियाट्रिक सर्जरी का चलन चल रहा है। लेकिन, इसमें विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। क्योंकि बेरियाट्रिक सर्जरी के बाद अगर जल्दबाजी में बच्चे की प्लानिंग करने वालों को समय से पहले डिलीवरी करानी पड़ती है। 80 फीसदी मामलों में ऐसा होता है। साथ शिशु भी सेहतमंद नहीं होता है। उन्होंने कहा कि ऐसी अवस्था में बेरियाट्रिक सर्जरी कराने वालों को सर्जरी के दो साल बाद ही बच्चे की प्लानिंग करनी चाहिए। उन्होंने इसका कारण बताते हुए कहा कि बेरियाट्रिक सर्जरी में स्टमक को छोटा कर दिया जाता है। जिसकी वजह से गर्भ में पल रहे शिशु को पूरी डाइट नहीं मिलती। उसको इंट्रा यूट्राइन ग्रोथ रिटार्डेशन की समस्या का सामना करना पड़ता है। उसका शारीरिक विकास नहीं हो पाता है।
एसजीपीजीआई से आईं डॉ. मन्दाकिनी प्रधान ने बताया कि 10 फीसदी गर्भवती महिलाओं को बीपी की शिकायत होती है। जिसकी वजह से जच्चा और बच्चा दोनों को मुश्किलों का सामना करना पड़ जाता है। उन्होंने बताया कि अब गर्भवती महिलाओं की बीपी की समस्या होने से पहले ही उसकी जांच की जा सकती है। उन्होंने बताया कि गर्भवती महिलाओं को आमतौर पर 20 हफ्ते बाद बीपी की शिकायत होती है। लेकिन, पीएलजीएफ ब्लड टेस्ट के जरिये बीपी की समस्या को पहले ही पकड़ा जा सकता है। इसकी जांच होने के बाद इसकी रोकथाम भी की जा सकती है। उन्होंने  बताया कि महिलाओं हिस्ट्री, वजन देखने के बाद पीएलजीएफ की जांच होती है। इसके बाद अल्ट्रसाउंड करते हैं। जिसके बाद यह पता चल जाता है कि महिला को बीपी की समस्या होगी या नहीं। अगर होने की संभावना होती है तो उसके लिए दवाइयां भी हैं। जिसे रात में खानी होती है। इससे बीपी को गंभीर होने से पहले ही कंट्रोल कर लिया जाता है।
मिनिस्ट्री ऑफ़ हेल्थ के मैटरनल हेल्थ एडवाइजर डॉ. दिनेश बंशवाल बताया कि सरकार ने गर्भवतियों के कई योजनाएं चलाई हैं। इसमें हाल ही में एक सुमन स्किम भी है। जिसे 10 अक्टूबर 2019 को शुरू किया गया है। उन्होंने बताया कि इस योजना में ग्रीवांस पोर्टल भी है। अगर गर्भवती को अस्पताल में इलाज नहीं मिल रहा है तो यहां शिकायत कर सकती हैं। इस पर अभी काम चल रहा है। इसके अलावा सभी अस्पतालों में समाजसेवियों की मदद से वालंटियर भी तैयार किये जाएंगे जो गर्भवतियों के इलाज में मदद करेंगे। इनको कम्युनिटी वालंटियर का नाम दिया जाएगा। इसके अलावा मैटरनल डेथ की सुचना देने वाले को एक हजार रूपये की प्रोत्साहसन राशि दी जाएगी। इसका मकसद है मैटरनल डेथ के आंकड़ों को इकट्ठा किया जाए और उस पर काम कर 2022 तक  मैटरनल डेथ को जीरो करने की प्लानिंग है। उन्होंने बताया कि जल्द ही सुचना देने लिए एक टोलफ्री हेल्पलाइन भी जारी की जाएगी।फॉग्सी की पूर्व प्रेजिडेंट रहीं डॉ. जयदीप मल्होत्रा ने दो आईआईटियन रवि तेजा और मयूर की मदद से आईमम्ज (iMumz) नाम का एक एप बनाया है.जिसमें गर्भवतियों से जुड़ी समस्याओं का समाधान किया जा रहा है. डॉ. जयदीप मल्होत्रा ने बताया कि इस एप में गर्भवतियों के लिए एक्सरसाइज, योग, ध्यान, गर्भ संवाद (गर्भ में शिशु से बातचीत) करने के तरीके दिए गए हैं.इसके अलावा गर्भवतियों के सवालों के जवाब देने के लिए एक्सपर्ट के तौर डॉक्टरों की एक टीम भी है जिसका वे जवाब देते हैं. उन्होंने बताया कि इसमें हिंदी और इंग्लिश दोनों वर्जन मौजूद हैं। छह हजार से ज्यादा लोग इसका उपयोग कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 2.7 मिलियन हर साल प्रेग्नेंसी के मामले आते हैं लेकिन इनके लिए मात्र एक लाख ही गाइनी के डॉक्टर हैं। ऐसे में समस्याएं काफी जटिल हैं।
अहमदाबाद से आए डॉ. एमसी पटेल ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ गर्भधारण करने के बाद डिलीवरी तक आठ बार जांच होनी चाहिए। जबकि भारत सरकार के अनुसार यह चार बार ही है। उन्होंने बताया कि यह गाइडलाइंस नार्मल गर्भवतियों के लिए है। डॉ. पटेल ने कहा कि जबकि यह जांचें नौ बार होनी चाहिए। सात महीने तक एक-एक जांच और उसके बाद 15-15 दिन पर जांच करानी चाहिए। इससे किसी भी प्रकार की समस्या को पकड़ने में आसानी होगी।

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