सप्रेम संस्थान ने मनाया पदमश्री रणवीर सिंह बिष्ट जन्मदिवस स्मृति समारोह 

निसर्ग के चितेरे का पुनर्गान
सप्रेम संस्थान ने मनाया पदमश्री रणवीर सिंह बिष्ट जन्मदिवस स्मृति समारोह

लखनऊ , प्रोफ़ेसर रणवीर सिंह बिष्ट के 91 जन्मदिन पर उनको स्मरण करते हुए वास्तु कला संकाय, अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी लखनऊ में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया कार्यक्रम के वक्ता गढ़ प्रोफेसर राज बिसारिया, अनिल रस्तोगी,  विमल थपलियाल, अखिलेश निगम एवं डॉ अवधेश मिश्र उपस्थित थे। बिष्ट जी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए कार्यक्रम की शुरुआत की गई । कार्यक्रम के आयोजक एवं उद्घोषक  भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने प्रोफेसर बिष्ट का जीवन परिचय देते हुए पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन के जरिए उनकी कलाकृतियों से वक्ताओं एवं कला प्रेमियों को रूबरू कराया । कार्यक्रम के वरिष्ठ रंगकर्मी पद्मश्री राज बिसारिया जी ने कहा की प्रोफेसर बिष्ट एक बहुत ही खोजी प्रवृत्ति के कलाकार थे जो अपने पारंपरिक माध्यम से हटकर अनेक माध्यम में प्रयोग किया करते थे। वे जितने अच्छे चित्रकार थे उतने ही अच्छे मूर्तिकार एवं विचारक भी थे।  अनिल रस्तोगी ने कहा कि रंगकर्म के क्षेत्र में भी उनका अभूतपूर्व योगदान है। उन्होंने अनेक स्तरों पर रंग कर्मियों और रंगकर्म को मदद की है, आर्थिक सहायता भी दिलवाई और एक संरक्षक की भूमिका में कलाकारों को प्रेरणा और प्रोत्साहन दिया करते थे ।उर्मिल थपलियाल ने अपना संस्मरण सुनाते हुए बताया की मैंने बिष्ट को काम करते हुए देखा है। वह कैनवस पर रंगों को बहाते थे और उसके बारे में पूछने पर बताते थे कि रंग अपना परफॉर्मेंस अपनी प्रकृति के अनुसार दे रहे हैं। और चित्रों की भाषा नहीं होती है, बोली होती है और जब बोली कलाकार के सृजन से जुड़कर कैनवस पर अभिव्यक्ति बनती है तो वह भाषा बन जाती है । श्री अखिलेश निगम ने अपने बाल्यकाल को याद किया जब वे प्रोफेसर बिष्ट का सानिध्य पाकर उनसे शिक्षा ग्रहण करते थे। अखिलेश जी ने बिष्ट के नीले और हरे रंगों के जुड़ाव को उनकी वेशभूषा से लेकर उनके आसपास की समस्त वस्तुओं और जीवनशैली से जोड़ते हुए यह बताया कि उनके कौन-कौन से प्रिय रंग थे। जिन पर वह चित्रण करते थे । कला दीर्घा पत्रिका के संपादक और वरिष्ठ कलाकार  अवधेश मिश्र ने बताया कि जहां पर प्रोफेसर बिष्ट निसर्ग के अति निकट थे और प्रकृति पर अनेक श्रृंखलाएं रच कर उन्होंने एक यथार्थवादी और रोमांसवादी कलाकार के रूप में अपना स्थान बनाया, वही ब्लू सीरीज के बाद समाज, तंत्र और राजनीति पर कटाक्ष करते श्रृंखला ब्लैक पेजेस ऑफ द इंडियन रिपब्लिक को भी रचा। सामाजिक सरोकार उनका यहीं खत्म नहीं हुआ बल्कि जीवन के अंतिम क्षणों में उन्होंने अनवांटेड सीरीज रचा । प्रोफेसर मिश्र ने बताया कि वह जितने इनोवेटिव थे उतने ही अच्छे चिंतक भी थे और उससे कहीं ज्यादा कवि हृदय और सरल व्यक्ति थे। स्वाभिमान उनमें कूट-कूट कर भरा था और कभी भी कला तथा कलाकारों को नहीं झुकने देते थे ना उनका अपमान बर्दाश्त कर सकते थे। ऐसे कला संरक्षकों की कला समाज में अत्यधिक आवश्यकता है, जो कला जगत का कुशलता से नेतृत्व कर सके और संक्रमण से बाहर निकाल कर उनको एक नई दिशा दे सके । इस कार्यक्रम को आयोजित करने हेतु वास्तु कला महाविद्यालय की प्रिंसिपल बंदना सहगल ने न कि सिर्फ स्थान उपलब्ध कराया, बल्कि उन्होंने कला और वास्तुकला महाविद्यालय की पुरानी यादों से आज के तमाम संदर्भों को जोड़ा । बिष्ट की सुपुत्री बरीला बिष्ट अतिथियों एवं सभा में पधारे कला प्रेमियों तथा कलाकारों को धन्यवाद ज्ञापित किया । इस अवसर पर अतिथियों द्वारा प्रो बिष्ट के जीवन और कृतियों पर आधारित एक कैटलॉग का विमोचन किया गया। इस अवसर पर विष्ट जी के परिवार से उनकी बहू.ममता विष्ट , राजेन्द्र एस फुलारी,गिरीश पांडेय, पुनीत कात्यायन, धीरज यादव, चंदन अग्रवाल, नेहा,अनुपम सहित कला महाविद्यालय और वास्तुकला संकाय के छात्र छात्राएं उपस्थिति रही।

 

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